मंजू श्रीवास्तव


 हम शादी के बाद तमिलनाडु के त्रिचनापल्ली शहर में गए. वहां कंपनी के टाउनशिप में रहने लगे.  1 साल बाद, मेरी बेटी पल्लवी का जन्म हुआ.  उसे लेकर हम टेरेस वाले क्वार्टर में शिफ्ट हुए. कुछ समय बाद  सामने श्रीयुत विवेक श्रीवास्तव, इनके बैचमेट रहने आए. उनकी नई नई शादी हुई थी. एक दिन मंजू श्रीवास्तव घर मिलने आई, वही मेरी मंजू से पहली मुलाकात थी. आते ही उसने छोटी पल्लवी को उठाकर बहुत प्यार किया.  बड़ी बड़ी आंखें लंबी चोटी और मैक्सी पहने हुए,  मुझे वह बहुत आकर्षक लगी. बोलने में बहुत सॉफ्ट स्पोकन लगी.  मैं की जगही हम से बातों की शुरुआत करती थी.  मुझे यह अच्छा लगा और याद भी रहा.  दोनों के दरवाजे आमने सामने थे.  बाकी सारे बैचलर थे.  बस फिर क्या था,  हमारा एक दूसरे के यहां आना जाना शुरू हुआ. सवेरे 8:00 बजे यह लोग ऑफिस जाते ही हमारी टेरेस पे महफिल लग जाती थी. आराम से चाय के साथ बातें होती थी.  मैं बातूनी और मंजू एकदम शांत स्वभाव और कम बात करने वाली थी. वह बनारस की थी. उसके पिताजी बनारस के माने हुए एडवोकेट थे. बड़ा परिवार था. मंजू घर में सबसे छोटी और लाडली थी. वह बनारस का इतना अच्छा वर्णन करती थी, के आज भी मुझे लगता है मैंने बनारस,  वहां के घाट, गंगा नदी,  मंजू का बड़ा घर, उसकी अम्मा सब जैसे देख लिया है.  हालांकि आज तक मैं बनारस नहीं जा पाई.  धीरे धीरे हम लोगों की दोस्ती बढ़ती गई.  पराए मुल्क में कोई अपना मिल जाए तो जिंदगी आसान हो जाती है. मेरी कुछ मराठी सहेलियां थी,  उनसे भी मंजू की दोस्ती हो गई. हम दोनों एक दूसरे से काफी चीजें सीखते थे.  मैंने मंजू से चाइनीज डिशेस बनाना सीखा था.  हम लोग केक बनाना भी वही सीखे थे. मैंने उसकी साड़ी देखकर अपनी साड़ी पर भी कढ़ाई की थी.  हमारे स्वभाव एकदम विपरीत होने के बावजूद,  हमारी दोस्ती और स्नेह कायम था.  कहते हैं ना ऑपोजिट पोल्स अट्रैक्ट.  उसका हंसमुख स्वभाव और शांत व्यक्तिमत्व मुझे बहुत भाता था.  उसका बड़ा बेटा प्रांजल का जन्म हुआ. हमें दोनों को बड़ा घर मिला, फिर भी के एक दूसरे के यहां आना जाना बना रहा. हमारी बड़ौदा ट्रांसफर हो गई. मुझे बहुत दुख हुआ.  मुझे आज भी याद है, मंजू ने हमें रास्ते के लिए टिफिन दिया था. उसमें केले के पत्ते टेबल मैट,  पानी की बोतल और बढ़िया खाना भेजा था.  स्नेह और मनका जो रिश्ता तब से बना है, वह आज 42 साल बाद भी कायम है. तब तो फोन भी नहीं थे.  चिट्ठियों का आना जाना भी कुछ साल बाद रुक गया था, मगर एक ही ऑफिस होने से पता चलता था. मंजू अब दिल्ली में सेटल हो गई है.  बड़ी बेटी पल्लवी कि दिल्ली मैं हुई शादीके रिसेप्शन के लिए हमने श्रीयुत विवेक और मंजू को आमंत्रित किया था. बहुत साल बाद उसे देख कर मुझे बहुत खुशी हुई. उसके बाद हम जब भी दिल्ली गए दो तीन बार मंजू के घर हो आए. अब तो फोन की सुविधा है. दोनों के बच्चे शादी हो कर सेटल हो गए हैं. हम लोगों के पास अब काफी समय है.  जिसको भी याद आती है वह फोन करके हम लोग काफी देर तक बातें करते हैं.  व्हाट्सएप पर फोटो और मैसेजेस का आदान-प्रदान होता है.  बातें करते वक्त  इतना हंसी मजाक होता है के बीच का अंतराल नष्ट हो जाता है और हम लोग पुरानी 24-25 साल की खिलखिलाती सहेलियां बन जाते हैं. हमारी मधुर दोस्ती ऐसे ही बनी रहे यह मैं भगवान से यही दुआ करती हूं.





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